दुर्गा पूजा 2026: महिषासुर मर्दिनी की कथा, षष्ठी से दशमी तक की तिथियाँ और पंडाल संस्कृति

आज महा षष्ठी है — 17 अक्टूबर 2026। ढाक की थाप पर माँ दुर्गा का बोधन हो चुका है, पंडालों के द्वार खुल गए हैं, और बंगाल की गलियों में उमंग की लहर दौड़ गई है। दुर्गा पूजा — भारत का वह महापर्व, जो देवी के महिषासुर पर विजय की कथा को हर साल नए सिरे से जीता है। आइए जानते हैं इस पर्व का अर्थ, पौराणिक कथा और 2026 की पूजा-तिथियाँ।

शेर पर सवार दस भुजाओं वाली देवी दुर्गा महिषासुर पर विजयी — दुर्गा पूजा 2026 पर आधारित भक्तिपूर्ण चित्र

महिषासुर मर्दिनी की कथा

दुर्गा पूजा की जड़ें मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य में बताई गई कथा में हैं। कथानुसार भैंसे के रूप वाले असुर महिषासुर को ऐसा वरदान था कि कोई पुरुष उसे मार नहीं सकता — इस बल पर उसने देवताओं को भी पराजित कर दिया। तब सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ मिलाकर देवी दुर्गा का सृजन किया, जिन्हें देवताओं ने दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए। शेर पर सवार दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिन-रात युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। बुराई पर अच्छाई की इसी विजय को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है — रिपोर्टों और पौराणिक परंपरा के अनुसार यही दुर्गा पूजा का मूल भाव है।

दुर्गा पूजा 2026: तिथियाँ और मुख्य अनुष्ठान

इस वर्ष महालय 10 अक्टूबर को पड़ा, जिसके साथ देवी पक्ष की शुरुआत हुई। मुख्य पाँच दिनों की पूजा इस प्रकार है:

  • महा षष्ठी (17 अक्टूबर): कल्पारम्भ और बोधन — देवी का औपचारिक आह्वान; पंडाल खुलते हैं।
  • महा सप्तमी (18 अक्टूबर): नवपत्रिका स्नान और प्राण प्रतिष्ठा — मुख्य पूजा की विधिवत शुरुआत।
  • महा अष्टमी (19 अक्टूबर): पुष्पांजलि, कुमारी पूजा और अष्टमी-नवमी की संधि में संधि पूजा — पर्व का सबसे पवित्र दिन माना जाता है।
  • महा नवमी (20 अक्टूबर): नवमी होम और महाभोग।
  • विजया दशमी (21 अक्टूबर): वरण, सिंदूर खेला और विसर्जन — देवी की विदाई।

बंगाल की पंडाल संस्कृति

दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव है, और इसकी आत्मा बसती है पंडालों में। कुम्हारटोली के कलाकार महीनों तक मिट्टी की मूर्तियाँ गढ़ते हैं; हर पंडाल की अपनी थीम होती है — कभी पुरानी हवेली, कभी आधुनिक कला। शाम को ढाक की थाप, धुनुची नाच और भीड़ से भरी गलियाँ इस पर्व को लोक-उत्सव में बदल देती हैं। कुमारी पूजा में छोटी बच्चियों को देवी के रूप में पूजा जाता है, और दशमी को विवाहित महिलाएँ एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला मनाती हैं।

क्यों है यह पर्व आज भी प्रासंगिक

दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं — यह समुदाय की ताकत का उत्सव है। हर साल हजारों लोग मिलकर पंडाल बनाते हैं, भोग बाँटते हैं, रात भर ठाकुर देखते हैं। यही सामूहिकता पर्व को पीढ़ियों से जीवित रखे है। त्योहारों के इस मौसम में परंपराओं पर बहस भी तेज़ रहती है — जैसे हाल में फराह खान के टीका विवाद ने दिखाया कि पुरानी रस्मों और आधुनिक नज़रिए के बीच संवाद अभी जारी है।

माँ दुर्गा की यह पूजा हमें याद दिलाती है कि अंधकार चाहे कितना भी बड़ा हो, साहस और एकजुटता से उस पर विजय पाई जा सकती है। शुभ दुर्गापूजा!

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