Mutual Fund Dire
ct Plans Become Default From November 1: What Changes for Your SIP
1 नवंबर 2026 से म्यूचुअल फंड खरीदने का तरीका बदलने जा रहा है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के अध्यक्ष तुहिन कांत पांडेय ने घोषणा की है कि एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर डायरेक्ट प्लान डिफॉल्ट विकल्प होंगे। यानी AMC की ऐप या वेबसाइट पर निवेशक को सबसे पहले डायरेक्ट प्लान दिखेगा, रेगुलर प्लान नहीं।
यह घोषणा 28 अक्टूबर को मुंबई में NDTV Profit IGNITE कार्यक्रम में की गई। SEBI के इस कदम का सीधा असर उन करोड़ों निवेशकों पर पड़ेगा जो SIP के ज़रिए म्यूचुअल फंड में पैसा लगाते हैं। समझते हैं कि आखिर बदला क्या है और आपकी SIP पर इसका क्या असर पड़ेगा।
डायरेक्ट और रेगुलर प्लान में फर्क क्या है
डायरेक्ट प्लान में निवेशक सीधे AMC से म्यूचुअल फंड की यूनिट खरीदता है — बीच में कोई डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता। चूंकि डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन नहीं लगता, इसलिए डायरेक्ट प्लान का कुल खर्च अनुपात (एक्सपेंस रेशियो) उसी स्कीम के रेगुलर प्लान से कम होता है।
रेगुलर प्लान में निवेशक किसी डिस्ट्रीब्यूटर या सलाहकार के ज़रिए निवेश करता है, और उस सेवा का कमीशन फंड के खर्च में जुड़ जाता है। अहम बात यह है कि दोनों प्लानों का पोर्टफोलियो, फंड मैनेजर, निवेश उद्देश्य और जोखिम प्रोफाइल एक ही होते हैं — फर्क सिर्फ लागत का है। लंबी अवधि में कम लागत का मतलब है निवेशक के हाथ में थोड़ा ज़्यादा रिटर्न रहना।
1 नवंबर से वास्तव में क्या बदलेगा
रिपोर्टों के अनुसार, 1 नवंबर से AMC के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर डायरेक्ट प्लान डिफॉल्ट के रूप में दिखेंगे। अगर कोई निवेशक रेगुलर प्लान चुनता है, तो उसे साफ-साफ बताया जाएगा कि उसके खर्च अनुपात ज़्यादा हैं। SEBI अध्यक्ष ने इस मौके पर कहा, "सुरक्षा इस बात पर भी निर्भर करती है कि निवेशकों को क्या बताया जाता है।"
इसका मतलब यह नहीं है कि रेगुलर प्लान बंद हो रहे हैं। जो निवेशक डिस्ट्रीब्यूटर या सलाहकार की सेवा चाहते हैं, वे अब भी रेगुलर प्लान चुन सकेंगे — बस उन्हें पहले लागत का अंतर दिखाया जाएगा। यानी फैसला निवेशक का ही रहेगा, लेकिन वह फैसला अब आंखें खोलकर होगा।
आपकी SIP पर क्या असर पड़ेगा
अगर आप पहले से AMC की ऐप या वेबसाइट से सीधे SIP चला रहे हैं, तो आपके लिए खास बदलाव नहीं है — आप पहले से ही डायरेक्ट रास्ते पर हैं। अगर आप डिस्ट्रीब्यूटर के ज़रिए निवेश करते हैं और सलाह की सेवा से संतुष्ट हैं, तो आप रेगुलर प्लान जारी रख सकते हैं, बस लागत का अंतर जानकर।
नए निवेशकों के लिए यह बदलाव खास तौर पर अहम है। अब पहली स्क्रीन पर ही उन्हें कम लागत वाला विकल्प दिखेगा, और उन्हें यह समझने का मौका मिलेगा कि कमीशन उनके रिटर्न पर कैसे असर डालता है। SEBI के एक सर्वे का हवाला देते हुए पांडेय ने यह भी बताया कि लगभग 63 प्रतिशत परिवार कम से कम एक प्रतिभूति बाज़ार उत्पाद के बारे में जानते हैं, लेकिन बाज़ार में भागीदारी सिर्फ लगभग 9.5 प्रतिशत है — यानी जानकारी और भागीदारी के बीच अभी बड़ा अंतर है।
बड़ी तस्वीर: SEBI और क्या बदल रहा है
इसी कार्यक्रम में SEBI अध्यक्ष ने कई और सुधारों का भी ज़िक्र किया। रिपोर्टों के अनुसार, SEBI मुख्य-बोर्ड IPO, फॉलो-ऑन ऑफर, SME IPO और इनोवेटर्स ग्रोथ प्लेटफॉर्म के नियमों की समीक्षा करेगा, और म्यूचुअल फंड लेनदेन के लिए नेट सेटलमेंट पर भी विचार चल रहा है। मकसद एक ही है — बाज़ार को ज़्यादा पारदर्शी, सुलभ और निवेशक-अनुकूल बनाना।
संदर्भ के लिए: रिपोर्टों के अनुसार, भारत का इक्विटी बाज़ार पूंजीकरण लगभग ₹470 लाख करोड़, म्यूचुअल फंड संपत्ति लगभग ₹83 लाख करोड़ है, और 15 करोड़ से अधिक विशिष्ट (यूनिक) निवेशक हैं। यानी यह बदलाव एक बहुत बड़े निवेशक वर्ग को छूएगा।
एक सावधानी ज़रूरी है: डायरेक्ट प्लान सस्ता है, लेकिन वह सलाह की जगह नहीं लेता। अगर आपको यह तय करने में मदद चाहिए कि कौन सी स्कीम आपकी ज़रूरत और जोखिम क्षमता के हिसाब से सही है, तो किसी पंजीकृत निवेश सलाहकार से सलाह लेना समझदारी होगी। यह लेख केवल सामान्य जानकारी है, निवेश सलाह नहीं।
स्रोत: बिज़नेस टुडे और इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्टों के अनुसार।
Global Insight को फॉलो करें — आपके पैसे और बाज़ार से जुड़ी खबरों की साफ और तथ्य-आधारित जानकारी के लिए।
