अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर पिछले कुछ महीनों में कई कहानियाँ एक साथ जुड़ी हैं — सैनिकों का आमना-सामना, नक्शों पर नामों की लड़ाई और एक बड़े बाँध पर स्थानीय विरोध। यह पोस्ट उन घटनाओं को शुरुआत से अब तक क्रम से रखती है। सभी तथ्य एक से अधिक स्वतंत्र स्रोतों से पुष्ट हैं।
विवाद की जड़: दावा, नाम और पुराने टकराव
चीन अरुणाचल प्रदेश को ज़ंगनान या दक्षिण तिब्बत कहकर अपना बताता है, जबकि भारत इसे अपना अभिन्न अंग बताता है। विदेश मंत्रालय कई बार कह चुका है कि अरुणाचल भारत का "था, है और रहेगा" हिस्सा है।
2017 से चीन समय-समय पर अरुणाचल के स्थानों के चीनी नाम जारी करता रहा है — 2017 में 6, 2021 में 15 और 2023 में 11 नामों की सूचियाँ आईं। भारत ने इस कवायद को "व्यर्थ और बेतुका" बताकर खारिज किया है।
पुराने टकराव भी इस पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं: 2017 में डोकलाम में 73 दिन का गतिरोध, जून 2020 में गलवान में 20 भारतीय सैनिकों की मौत, और 2022 में यांग्त्से में टकराव।
अगस्त 2026 में भारत ने इसका जवाब नक्शे से दिया। सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शों पर अरुणाचल के 27 स्थानों के मानक नाम दर्ज किए गए, जिनमें लोंगजू भी है। लोंगजू 1959 से चीन के नियंत्रण में बताया जाता है, लेकिन वह भारतीय दावा रेखा के भीतर आता है।
जून–सितंबर 2026: ज्ञापन, टकराव और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
26 जून 2026 को टक्सिंग की नाह वेलफेयर सोसायटी ने अपर सुबनसिरी के उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा। इसमें कहा गया कि चीनी सेना ने पारंपरिक चरागाह क्षेत्रों में सड़कें, पुल और सैन्य शिविर बनाए हैं। संगठन ने पाँच स्थानों के नाम दिए — ओयिंग (आसाफिला), पनियार (चुजार्ता), मारपन (मारनाफे), पोत्रंग झील और तिंडिंगतांग — और कहा कि 2020 के बाद यह गतिविधि बढ़ी है।
29 जून को भारतीय सेना ने इन आरोपों को "गलत और निराधार" बताकर खारिज कर दिया, जबकि राज्य सरकार ने ज़िला प्रशासन से रिपोर्ट माँगने की बात कही।
जुलाई के अंत में आसाफिला में स्थिति और बिगड़ी। रिपोर्टों के अनुसार, माजा के पास भारत की धारणा वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से लगभग 6-7 किलोमीटर भीतर चीनी सैनिकों ने ऊँचे स्थान पर तंबू लगा दिए। भारत ने भी अपनी तैनाती बढ़ाई। यह दूरी सरकारी सूत्रों के हवाले से आई है।
12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हुए। रिपोर्टों के अनुसार, सीमा पर तनाव इस दौरान भी बना रहा।
अक्टूबर 2026: आधिकारिक पुष्टि, बातचीत और सियांग विरोध
22 अक्टूबर को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने अलवर में पुष्टि की कि अरुणाचल में कई स्थानों पर आमना-सामना हुआ है और "यह अभी भी जारी है"। यह जुलाई से चल रहे तनाव की पहली आधिकारिक पुष्टि थी।
23 अक्टूबर को विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीमा पर घर्षण तब होता है जब चीनी बल निर्धारित गश्त पैटर्न से हट जाते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, टक्सिंग टकराव के बाद वाचा-दमई में कोर कमांडर स्तर की आपात बातचीत भी हुई थी। पृष्ठभूमि के लिए इंडियन एक्सप्रेस की यह व्याख्या देखें।
उसी रात सियांग घाटी में विरोध हिंसक हो गया। एनएचपीसी की 11,200 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देश्यीय परियोजना के विरोध में प्रदर्शन के दौरान रिपोर्टों के अनुसार लगभग 40 पुलिसकर्मी पत्थरबाज़ी में घायल हुए, थाने और एनएचपीसी कार्यालय में तोड़फोड़ हुई और कुछ जनप्रतिनिधियों के घरों पर हमला हुआ। पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े।
24 अक्टूबर को मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने पत्रकारों से कहा — "हमसे सवाल कीजिए, हमसे संवाद कीजिए, हिंसा के बजाय।" भारत का कहना है कि यह बाँध तिब्बत में चीन की 167 अरब डॉलर की याक्सिया परियोजना का जवाब है, जिससे ब्रह्मपुत्र के प्रवाह पर असर की आशंका है। बीजिंग का कहना है कि उसकी परियोजना का निचले इलाकों पर कोई नकारात्मक असर नहीं होगा, जबकि स्थानीय समुदायों को अपने घर और ज़मीन छिनने का डर है। सियांग विरोध की एएफपी रिपोर्ट में यह घटनाक्रम दर्ज है।
अरुणाचल में एनएचपीसी की कमला पनबिजली परियोजना पर भी वन मंज़ूरी को लेकर विवाद हो चुका है — Global Insight की यह रिपोर्ट देखें। सियांग परियोजना उससे अलग है।
आगे क्या देखना होगा
इस घटनाक्रम में तीन धागे एक साथ आए हैं — सैन्य टकराव, नक्शों की लड़ाई और बाँध का विरोध। आगे नज़र आधिकारिक बयानों, सियांग पर सरकार-समुदाय संवाद और सीमा पर गश्त की स्थिति पर रहेगी। नई पुष्टि तक दावों को रिपोर्ट के रूप में ही पढ़ें।
ऐसी ही सत्यापित खबरों और विश्लेषण के लिए Global Insight को फॉलो करें।