मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रहे विवाद में चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष साफ कर दिया। आयोग ने कहा कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले कोई फैसला नहीं लिया और फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग ने यह भी कहा कि उसके खिलाफ दायर याचिकाएं सिर्फ एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित हैं, जिसे कानून की नजर में सबूत नहीं माना जाता।
आयोग ने क्या कहा
चुनाव आयोग ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाबी हलफनामे में कही है। यह हलफनामा राकेश कुमार सिंह की याचिका के जवाब में दायर किया गया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाए गए थे। आयोग के अनुसार, यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से दायर किया गया है।
आयोग ने कहा कि एसआईआर से जुड़े तीनों आदेश — जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में जारी — आयोग के सभी सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए फैसले थे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी फाइल पर विचार के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई टिप्पणियां, सवाल या सुझाव आयोग का अंतिम फैसला नहीं होते। फाइलें सामान्य तौर पर एक चुनाव आयुक्त से दूसरे चुनाव आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त तक जाती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी ली जा सकती है, जिसे बाद में फाइल में दर्ज किया जाता है।
फॉर्म 6 विवाद क्या है
फॉर्म 6 मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि एसआईआर के दौरान इस फॉर्म में बदलाव किया गया। चुनाव आयोग ने इस आरोप को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। आयोग के अनुसार, “फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसमें बदलाव सिर्फ केंद्र सरकार कर सकती है। एसआईआर घोषणा एक अलग दस्तावेज है।”
यह बात इसलिए अहम है, क्योंकि फॉर्म 6 में बदलाव का आरोप एसआईआर की पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाता था। आयोग का कहना है कि एसआईआर घोषणा पत्र और फॉर्म 6 दो अलग-अलग दस्तावेज हैं, इसलिए घोषणा पत्र को फॉर्म में बदलाव नहीं माना जा सकता। अदालत इस तर्क को स्वीकार करती है या नहीं, यह सुनवाई के बाद ही पता चलेगा।
याचिकाओं पर आयोग का रुख
आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त को काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका का भी विरोध किया है। आयोग के अनुसार, यह मांग सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होती है। आयोग ने यह भी कहा कि 28 जुलाई का कार्य आवंटन आदेश एक प्रतिनियुक्ति पर आए अतिरिक्त सचिव ने जारी किया था, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अगले दिन कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा और 30 जुलाई के संयुक्त निर्देश के बाद वह आदेश लागू नहीं हुआ।
आयोग ने यह भी कहा कि अपने अधिकार से बाहर आदेश जारी करने वाले किसी भी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, आयोग ने विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा है, क्योंकि दशहरा अवकाश के कारण वह अभी संक्षिप्त जवाब ही दाखिल कर सका है।
आगे क्या होगा
रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को इन याचिकाओं पर सुनवाई कर सकता है। सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि आयोग के तर्क पर्याप्त हैं या इस मामले में और जांच की जरूरत है। इस बीच, एसआईआर को लेकर राजनीतिक विवाद भी जारी है। विपक्षी गठबंधन ने 30 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ‘जनता द्वारा महाभियोग’ और 1 नवंबर को दिल्ली चलो मार्च का ऐलान पहले ही कर रखा है।
इसलिए यह मामला सिर्फ एक हलफनामे तक सीमित नहीं है। एक तरफ अदालत में कानूनी बहस चल रही है, दूसरी तरफ सड़कों पर राजनीतिक आंदोलन की तैयारी हो रही है। दोनों का नतीजा मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव प्रक्रिया पर जनता के भरोसे को प्रभावित करेगा। हम इस मामले की सुनवाई और उसके बाद के घटनाक्रम पर नजर बनाए रखेंगे।
स्रोत: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, एबीपी लाइव। एसआईआर विवाद से जुड़ी खबरों के लिए पढ़ें: इंडिया गठबंधन 30 अक्टूबर को सीईसी का ‘जनता महाभियोग’ करेगा, 1 नवंबर को दिल्ली चलो मार्च और राहुल गांधी सुल्तानपुर मानहानि मामले में बरी: 2018 में अमित शाह पर टिप्पणी का मामला।
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