विपक्षी इंडिया गठबंधन ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपने आंदोलन को एक नए चरण में ले जाने का ऐलान किया है। गठबंधन 30 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक सांकेतिक ‘जन महाभियोग’ (पब्लिक इम्पीचमेंट) की कार्यवाही करेगा, और इसके अगले ही दिन, 1 नवंबर को ‘दिल्ली चलो’ मार्च निकालेगा। यह ऐलान 24 अक्टूबर को कांग्रेस महासचिव (संगठन) के. सी. वेणुगोपाल ने किया।
इस ऐलान का सबसे अहम पहलू यह समझना है कि 30 अक्टूबर की कार्यवाही एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम है — इसका कोई कानूनी बल नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की असली संवैधानिक प्रक्रिया संसद के ज़रिए ही होती है। लेकिन विपक्ष इसे जनता के बीच अपना मामला रखने का मंच बनाना चाहता है, और 1 नवंबर की रैली को अपने आंदोलन की सबसे बड़ी ताक़त दिखाने का मौका मान रहा है।
30 अक्टूबर को क्या होगा?
रिपोर्टों के अनुसार, 30 अक्टूबर की दोपहर नई दिल्ली के अशोक होटल में एक ‘मॉक पार्लियामेंट’ (प्रतीकात्मक संसद) का आयोजन होगा। इसमें विपक्षी सांसद और इंडिया गठबंधन के वरिष्ठ नेता शामिल होंगे। इस मंच पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पर चर्चा होगी और चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए जाएँगे। कार्यवाही के अंत में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक ‘जनता का फ़ैसला’ (पब्लिक वर्डिक्ट) सुनाया जाएगा।
वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ‘संविधान बचाने और वोट चोरों को हराने’ के प्रयास के तहत यह कार्यवाही की जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता का फ़ैसला ‘ज़ोर से और साफ़’ सुनाया जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इंडिया गठबंधन के सभी दलों के नेताओं से दोनों कार्यक्रमों में दिल्ली में मौजूद रहने का आग्रह किया है।
महाभियोग का संवैधानिक तरीक़ा क्या है?
यह समझना ज़रूरी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना एक कठिन संवैधानिक प्रक्रिया है। संविधान के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को — यानी संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव के ज़रिए। इसलिए 30 अक्टूबर का कार्यक्रम, चाहे जितना बड़ा हो, कानूनी रूप से आयुक्त को नहीं हटा सकता।
विपक्षी नेताओं के अनुसार, संसद में महाभियोग का नोटिस तीसरी बार लाने की भी योजना है। इससे पहले इस तरह के नोटिसों पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन वे आगे नहीं बढ़ पाए। मॉक पार्लियामेंट का मक़सद, एक विपक्षी नेता के अनुसार, मुद्दों की विस्तार से जाँच और जनता तक अपनी चिंताएँ पहुँचाना है — इस मंच पर न्यायाधीशों, क़ानूनी विशेषज्ञों और आम लोगों को भी आमंत्रित करने की बात कही गई है।
1 नवंबर को ‘दिल्ली चलो’ मार्च
30 अक्टूबर की कार्यवाही के बाद, 1 नवंबर को इंडिया गठबंधन ‘दिल्ली चलो’ मार्च निकालेगा, जो रामलीला मैदान में समाप्त होगा। वेणुगोपाल के अनुसार, इस मार्च में कम से कम दस लाख नागरिकों के शामिल होने का लक्ष्य रखा गया है। कांग्रेस इसे ‘वोट चोरी’ के खिलाफ अपना सबसे बड़ा प्रदर्शन बता रही है।
इससे पहले की योजना के अनुसार यह कार्यक्रम 28 अक्टूबर को होना था, लेकिन उपयुक्त स्थान न मिलने के कारण तारीख़ बदलकर 30 अक्टूबर कर दी गई। एक विपक्षी नेता के अनुसार, तालकटोरा स्टेडियम भी विकल्पों में था, लेकिन वह उपलब्ध नहीं था। कांग्रेस ने अपने फ्रंटल संगठनों और दिल्ली इकाई के नेताओं के साथ बैठकें करके 1 नवंबर की रैली को सफल बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विवाद है — विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों में हेरफेर हुई है, जबकि सत्ता पक्ष और आयोग इन आरोपों को ख़ारिज करते रहे हैं। एसआईआर के खिलाफ पहले भी विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं, जैसे एसआईआर के खिलाफ 23 अक्टूबर का मार्च।
दूसरा पक्ष क्या कहता है?
भारतीय जनता पार्टी ने इस सांकेतिक महाभियोग की योजना की निंदा की है और इसे संस्थाओं पर हमला बताया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से और क़ानून के अनुसार काम करता है। चुनाव आयोग की ओर से भी पहले यह रुख़ रहा है कि वह संवैधानिक दायरे में निष्पक्ष चुनाव कराता है।
इस तरह, आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में रहने वाला है। 30 अक्टूबर का कार्यक्रम यह दिखाएगा कि विपक्ष अपने आरोपों को किस तरह जनता के सामने रखता है, और 1 नवंबर की रैली यह बताएगी कि ज़मीनी स्तर पर इस आंदोलन को कितना समर्थन मिलता है। लेकिन कानूनी तौर पर, मुख्य चुनाव आयुक्त का भविष्य संसद की प्रक्रिया पर ही निर्भर करेगा — न कि किसी सांकेतिक कार्यवाही पर।
मूल स्रोत: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ़।
ऐसी ही अहम खबरों और विश्लेषण के लिए Global Insight को फ़ॉलो करें।
