अगर आप नौकरीपेशा हैं और हर महीने आपकी सैलरी से पीएफ कटता है, तो यह खबर सीधे आपकी जेब से जुड़ी है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) अब आपके पीएफ पर मिलने वाले ब्याज को बाजार के झटकों से बचाने के लिए 25,000 करोड़ रुपये का एक अलग सुरक्षा कोष बनाने पर विचार कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार इस प्रस्ताव पर ईपीएफओ की निवेश समिति में विस्तार से चर्चा हो चुकी है, और अब इसे संगठन के निवेश ढांचे की समीक्षा कर रहे एक उच्चस्तरीय पैनल को भेज दिया गया है।
इस कोष का नाम है — ब्याज स्थिरीकरण रिजर्व (Interest Stabilisation Reserve)। इसका मकसद है कि बॉन्ड बाजार में गड़बड़ी या किसी कंपनी के डिफॉल्ट की वजह से पीएफ खाताधारकों को मिलने वाला सालाना ब्याज अचानक न घटे। ईपीएफओ के करीब 30 करोड़ सदस्य हैं, इसलिए यह प्रस्ताव करोड़ों परिवारों की बचत से जुड़ा है।

समस्या क्या है: घाटा सीधे ब्याज खाते में जाता है
अभी व्यवस्था यह है कि ईपीएफओ के निवेश में जब कोई बॉन्ड downgrade होता है या किसी संकटग्रस्त संपत्ति को घाटे में बेचना पड़ता है, तो वह नुकसान सीधे ब्याज खाते में दर्ज होता है। इससे सदस्यों में बांटने के लिए उपलब्ध आय घट जाती है और सालाना ब्याज दर पर दबाव पड़ता है।
रिपोर्टों के अनुसार इस अध्ययन में यह चेतावनी भी दी गई है कि सिर्फ शेयर बाजार से जुड़े ईटीएफ के मुनाफे पर भरोसा करना खतरनाक है। वजह यह है कि क्रेडिट संकट और शेयर बाजार की गिरावट अक्सर एक साथ आते हैं — 2019-20 में आईएलएंडएफएस जैसे मामलों के समय यही हुआ था। उस साल पोर्टफोलियो का घाटा बढ़कर 55,640 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
यह कोष कैसे काम करेगा
प्रस्ताव आईआईएम कोझिकोड के एक अध्ययन पर आधारित है। अध्ययन के अनुसार यह रिजर्व धीरे-धीरे बनाया जाएगा — ईटीएफ से मिलने वाले अतिरिक्त पूंजीगत लाभ और अतिरिक्त ब्याज आय से। और इस पैसे को सिर्फ तरल सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में लगाया जाएगा, ताकि पूंजी पूरी तरह सुरक्षित रहे, तुरंत नकदी मिल सके और सरकार की गारंटी बनी रहे।
अध्ययन ने सबसे खराब स्थिति का हिसाब लगाकर पाया कि कुल बुनियादी कमी करीब 23,837 करोड़ रुपये बैठती है। बाजार के अधूरे आंकड़ों को ध्यान में रखकर इसने 25,000 करोड़ रुपये का कोष बनाने की सिफारिश की है। 2010-11 से 2023-24 तक के ऐतिहासिक आंकड़ों पर जांच में यह रकम सामान्य आर्थिक चक्रों में सालाना कमी को संभालने में सक्षम पाई गई — सिर्फ 2019-20 जैसा असाधारण साल अपवाद रहा, जब घाटा इतना बढ़ा कि कोष में गहरी सेंध लगती।
इस कोष का एक और फायदा यह होगा कि पोर्टफोलियो मैनेजर संकटग्रस्त संपत्तियों से जल्दबाजी में भारी घाटे पर निकलने के बजाय धीरे-धीरे, अनुशासित तरीके से बाहर निकल सकेंगे। भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार अभी उथला है, इसलिए मजबूरी में बेचने पर बड़े haircut झेलने पड़ते हैं — यह कोष उसी दबाव को कम करेगा।
अभी क्या साफ नहीं है — और क्या न समझें
सबसे जरूरी बात: यह अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है, मंजूर नीति नहीं। रिपोर्टों के अनुसार इस पर कोई अंतिम मंजूरी नहीं मिली है और लागू होने की कोई तारीख तय नहीं है। इसलिए इसे पीएफ ब्याज दर में बढ़ोतरी या कटौती की घोषणा के रूप में न पढ़ें — मौजूदा ब्याज दर पर इसका कोई तत्काल असर नहीं है। सदस्यों को इसके लिए कोई आवेदन नहीं करना है और किसी के खाते से कोई नई कटौती भी प्रस्तावित नहीं है।
फिर भी यह दिशा अहम है। पीएफ देश के करोड़ों कर्मचारियों की रिटायरमेंट बचत है। अगर भविष्य में बाजार की उठापटक के बीच ब्याज दर स्थिर रहती है, तो यह भरोसा बढ़ेगा कि मेहनत की कमाई के एक हिस्से पर मिलने वाला रिटर्न अचानक नहीं डगमगाएगा। अगली नजर उच्चस्तरीय पैनल की सिफारिश और ईपीएफओ के केंद्रीय बोर्ड के फैसले पर रहेगी।
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स्रोत: द टाइम्स ऑफ इंडिया और WION की रिपोर्टों के अनुसार।