भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता आज से लागू: सेब पर शुल्क 25%, कीवी शुल्क-मुक्त

आज 20 अक्टूबर 2026 से भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) लागू हो गया है, और इसी के साथ दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। इससे एक दिन पहले 19 अक्टूबर को वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने इस समझौते के तहत पहला टैरिफ-रेट कोटा (टीआरक्यू) सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिससे यह साफ हो गया कि न्यूजीलैंड से आने वाले फलों और शहद पर कम शुल्क कैसे और कब मिलेगा।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजीएफटी का यह नोटिस सिर्फ कागज़ी घोषणा नहीं है — यही वह वास्तविक प्रणाली है जिसके जरिए कोटा, शुल्क और आयात की समय-सीमा तय होगी। इसमें न्यूजीलैंड के सेब, कीवी, मनुका शहद और अल्बुमिन के लिए साल-दर-साल बढ़ने वाले कोटे, न्यूनतम आयात मूल्य और आयात की तय अवधि का ब्योरा है। यानी समझौता आज से लागू है, लेकिन हर उत्पाद का रियायती लाभ इसी नोटिस के नियमों से मिलेगा।

भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते के तहत आयात कोटे का एआई-चित्रण

सेब और कीवी के लिए कोटा प्रणाली कैसे काम करेगी

सेब सबसे बड़ा लाभार्थी है। डीजीएफटी के नोटिस के अनुसार, न्यूजीलैंड से आयात होने वाले सेब पर कोटे के भीतर आयात शुल्क 25 प्रतिशत होगा, जबकि वर्तमान में यह 50 प्रतिशत है — यानी शुल्क आधा हो जाएगा। हालांकि पहले साल में सेब के लिए कोई कोटा नहीं होगा; कोटा दूसरे साल यानी 2027 से शुरू होगा, जब यह 35,000 टन होगा और छठे साल तक बढ़कर 45,000 टन तक पहुंच जाएगा। आयात की अवधि 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक तय की गई है और शर्त यह है कि न्यूनतम सीआईएफ मूल्य 1.25 डॉलर प्रति किलोग्राम से कम नहीं होना चाहिए।

कीवी के लिए शर्तें और भी आकर्षक हैं। कीवी पर टीआरक्यू के तहत शून्य शुल्क मिलेगा, बशर्ते न्यूनतम सीआईएफ मूल्य 1.80 डॉलर प्रति किलोग्राम हो। कीवी का कोटा दूसरे साल 8,000 टन से शुरू होकर छठे साल तक 15,000 टन तक बढ़ेगा, और इसके आयात की अवधि 1 अप्रैल से 15 अक्टूबर तक तय की गई है।

मनुका शहद और अल्बुमिन: छोटे उत्पाद, बड़ी राहत

मनुका शहद के लिए 2026 में 40 टन का कोटा रखा गया है, जो 2027 से हर साल 200 टन हो जाएगा। यह शहद एमपीआई-प्रमाणित होना चाहिए। द हिंदू बिज़नेसल़ाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, अल्बुमिन के लिए भी कोटा तय है — पहले साल 200 टन से शुरू होकर पांचवें साल तक यह 3,000 टन तक पहुंचेगा, और इस पर 11 प्रतिशत शुल्क लगेगा।

यहां यह समझना जरूरी है कि टीआरक्यू प्रणाली कैसे काम करती है। सरकार ने "कोटा + न्यूनतम मूल्य + समय-सीमा" का त्रिकोण बनाया है: तय मात्रा से अधिक आयात पर रियायती शुल्क नहीं मिलेगा, न्यूनतम सीआईएफ मूल्य सस्ते माल की बाढ़ रोकेगा, और तय आयात अवधि यह सुनिश्चित करेगी कि विदेशी फल उसी मौसम में आएं जब घरेलू आपूर्ति कम रहती है। यही वह वास्तविक तंत्र है जो डीजीएफटी के नोटिस के जरिए लागू होगा।

भारतीय निर्यातकों के लिए भी बड़ा फायदा

यह समझौता एकतरफा नहीं है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, न्यूजीलैंड ने भारतीय वस्तुओं के लिए 8,284 टैरिफ लाइनों पर शुल्क हटा दिया है, जिससे भारतीय निर्यातकों को वहां के बाज़ार में सीधा फायदा मिलेगा। इस तरह दोनों देशों के बीच व्यापार का दायरा फल-सब्ज़ियों से आगे बढ़कर औद्योगिक और उपभोक्ता वस्तुओं तक पहुंचेगा।

उपभोक्ताओं के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि अगले कुछ सालों में प्रीमियम फलों — खासकर न्यूजीलैंड के सेब और कीवी — की कीमतों में कमी आ सकती है। वहीं हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के सेब उत्पादकों के लिए यह एक नई प्रतिस्पर्धा भी लेकर आएगा, जिसका असर कोटे के चरणबद्ध विस्तार के साथ धीरे-धीरे दिखेगा।

निष्कर्ष: कोटे की कतार में पहला कदम

आज से लागू हुआ यह समझौता कागज़ पर जितना बड़ा है, उसका असली परीक्षण डीजीएफटी के कोटा नोटिस के क्रियान्वयन में होगा। पहले साल सेब के लिए कोटा न होना दर्शाता है कि सरकार ने घरेलू उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की चरणबद्ध रणनीति अपनाई है। अगर आयातक न्यूनतम मूल्य और समय-सीमा की शर्तों का पालन करते हैं, तो उपभोक्ताओं को सस्ते फल मिलेंगे और व्यापारियों को पारदर्शी नियम — यानी दोनों पक्षों के लिए जीत की स्थिति।

रिपोर्टों के अनुसार, यह एफटीए भारत के उन चुनिंदा व्यापार समझौतों में शामिल हो गया है जिनमें कृषि आयात पर शुल्क-कटौती के साथ मात्रा और मूल्य की सख्त शर्तें भी हैं। आगे की निगरानी इसी पर रहेगी कि कोटा कितनी तेजी से भरता है और घरेलू बाज़ार पर इसका क्या असर पड़ता है। अधिक जानकारी के लिए इकोनॉमिक टाइम्स की पूरी रिपोर्ट यहां और द हिंदू बिज़नेसल़ाइन की रिपोर्ट यहां पढ़ें।

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