देश के सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूलों में छात्राओं के लिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन सुविधाएं सुनिश्चित करने के अपने फैसले के अमल को लेकर सख्त रुख अपनाया है। 13 अक्टूबर की सुनवाई में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर फैसला सिर्फ कागज़ पर रहेगा, तो इस मौलिक अधिकार को ज़मीन पर कौन उतारेगा। अदालत ने चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक जानकारी न देने वाले राज्यों के मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस का सामना करना पड़ सकता है।
अदालत ने क्यों जताई नाराज़गी
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के बाद केंद्र सरकार से कहा था कि वह हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से यह लिखित जानकारी ले कि फैसले पर अमल के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी मांगी थी, लेकिन ज़्यादातर ने जवाब नहीं दिया। इस पर पीठ ने कहा, "हम यह समझ नहीं पा रहे कि जब संघ ज़रूरी जानकारी मांगता है, तो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जवाब क्यों नहीं देते।" द हिंदू की इस रिपोर्ट में सुनवाई का पूरा ब्योरा दिया गया है।
"क्या फैसला सिर्फ कागज़ पर रहेगा?"
सुनवाई के दौरान पीठ ने तीखा सवाल उठाया — "अगर फैसले में हमारी कही गई बातें सिर्फ कागज़ पर रह जाएंगी, तो संघ, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को कैसे लागू करेंगे?" यह टिप्पणी एबीपी लाइव और डायनामाइट न्यूज़ की रिपोर्टों में दर्ज है। अदालत ने कहा कि उसने मेंस्ट्रुअल हाइजीन को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का एक पहलू घोषित किया है, और इस फैसले का मकसद उन किशोरियों की मदद करना है जो मेंस्ट्रुअल हाइजीन की दिक्कतों के कारण — खासकर दूर-दराज़ के इलाकों में — पढ़ाई छोड़ देती हैं।
पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ज़रूरी जानकारी देने का एक आखिरी मौका देते हुए मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर, 2026 को तय की है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर अगली तारीख को केंद्र ने बताया कि कुछ राज्य या केंद्र शासित प्रदेश अब भी जवाब नहीं दे रहे, तो संबंधित मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस जारी किया जाएगा। एबीपी लाइव की इस रिपोर्ट में चेतावनी का ब्योरा पढ़ा जा सकता है।
जनवरी का ऐतिहासिक फैसला और अब तक की प्रगति
गौरतलब है कि 30 जनवरी को दिए गए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मेंस्ट्रुअल स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। यह फैसला डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में आया था, जिसमें केंद्र सरकार की 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन नीति' को कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए देशभर में लागू करने की मांग की गई थी।
फैसले में अदालत ने निर्देश दिया था कि शहरी और ग्रामीण — दोनों क्षेत्रों के सभी स्कूलों (सरकारी हो या निजी) में पानी की सुविधा वाले कार्यात्मक, लिंग-अलग शौचालय हों और हर छात्रा को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन दिए जाएं, साथ ही अपशिष्ट निपटान की उचित व्यवस्था हो। रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र ने अदालत को बताया था कि देशभर के स्कूलों में 30,458 लिंग-अलग शौचालय बनाए जा चुके हैं, जबकि 4,236 निर्माणाधीन हैं। एक सितंबर के आदेश में अदालत ने खासतौर पर उन स्कूलों की पहचान पर ज़ोर दिया था जहां लड़कियों और लड़कों के लिए अलग कार्यात्मक शौचालय, पानी के कनेक्शन और निजता की सुविधा नहीं है।
विश्लेषण: फैसला कागज़ पर न रह जाए, यही असली परीक्षा है
इस मामले की सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने अधिकार तो घोषित कर दिया, लेकिन उसे ज़मीन पर उतारने की ज़िम्मेदारी राज्यों की है — और वहीं सबसे बड़ी खामी दिख रही है। केंद्र के बार-बार पूछने पर भी राज्यों का जवाब न देना यह बताता है कि नीतिगत घोषणाओं और ज़मीनी अमल के बीच की खाई अभी भी गहरी है। दूर-दराज़ के इलाकों की किशोरियों के लिए यह सिर्फ सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा, गरिमा और स्वास्थ्य का सवाल है। 14 दिसंबर की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या यह ऐतिहासिक फैसला वाकई बदलाव लाता है या फाइलों में दबकर रह जाता है। अवमानना की चेतावनी से कम से कम इतना तो साफ है कि अदालत इस बार सिर्फ इंतज़ार नहीं करेगी।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी है, चिकित्सा सलाह नहीं।
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