Uttarakhand's 115-Km Locked Fault Is Storing Energy for an 8.1-Magnitude Earthquake: New Study

हिमालय के नीचे एक अदृश्य घड़ी टिक रही है — और अब वैज्ञानिकों ने उसकी चाल को मिलीमीटर की सटीकता से माप लिया है। 21–22 अक्टूबर को सामने आए एक नए अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड के नीचे मुख्य हिमालयी भ्रंश (Main Himalayan Thrust) का करीब 115 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा "लॉक" है — यानी वह हिलने के बजाय ऊर्जा जमा कर रहा है।

हिमालय के नीचे लाल रंग में चमकते लॉक्ड भ्रंश खंड और ऊपर की ओर उठती धरती का वैज्ञानिक चित्रण


शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस खंड में हर साल करीब 18 मिलीमीटर का स्लिप डेफिसिट जमा हो रहा है और धरती 4 से 6 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से ऊपर उठ रही है। एक सदी में जमा यह तनाव इतनी ऊर्जा के बराबर होगा, जितनी 8.1 तीव्रता के भूकंप में निकलती है।

सबसे जरूरी बात: यह किसी भूकंप की भविष्यवाणी नहीं है। शोधकर्ता खुद कहते हैं कि यह अध्ययन यह नहीं बताता कि भूकंप कब आएगा — यह दशकों की भूगर्भीय प्रक्रिया का आकलन है।

अध्ययन में क्या पाया गया

यह शोधपत्र — "Evidence of strong plate coupling in the Uttarakhand Himalayas: Constraints from GNSS and ALOS-2 InSAR observations" — दिब्याशक्ति पांडा, मृदुल यादव, एरिक ओ. लिंडसे और जी. श्रीनिवास राव सहित वैज्ञानिकों की टीम ने तैयार किया है, जिनमें तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी शामिल हैं। इसे 2026 में यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन की जनरल असेंबली (EGU) में प्रस्तुत किया गया और इस सप्ताह यह खबरों में आया।

टीम ने जमीन पर लगे GNSS स्टेशनों और जापान के ALOS-2 उपग्रह के रडार (InSAR) डेटा को मिलाकर उत्तराखंड के नीचे भ्रंश की हलचल को मापा। नतीजा: मेन हिमालयन थ्रस्ट का लगभग 115 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा "मजबूत प्लेट कपलिंग" दिखाता है — यानी वह खंड जकड़ा हुआ है, जबकि उसके आसपास की प्लेटें खिसक रही हैं।

'लॉक्ड फॉल्ट' का मतलब — ऊर्जा कैसे जमा होती है

हिमालय इसलिए बना है क्योंकि भारतीय प्लेट उत्तर की ओर धकेल रही है और यूरेशियन प्लेट के नीचे घुस रही है। आमतौर पर भ्रंश के साथ-साथ प्लेटें धीरे-धीरे खिसकती रहती हैं। लेकिन जहां भ्रंश "लॉक" होता है, वहां रगड़ इतनी ज्यादा होती है कि प्लेटें खिसक नहीं पातीं — प्लेट आगे बढ़ना चाहती है, पर भ्रंश उसे रोक देता है।

यही रुकावट "स्लिप डेफिसिट" पैदा करती है: हर साल जो करीब 18 मिलीमीटर का खिसकाव होना चाहिए था, वह नहीं होता और तनाव के रूप में जमा होता जाता है। इसी दबाव से धरती भी हर साल 4–6 मिलीमीटर ऊपर उठ रही है। जब तनाव रगड़ की सीमा तोड़ता है, तो जमा ऊर्जा एक झटके में निकलती है — और यही भूकंप होता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस खंड में एक सदी में जमा तनाव 8.1 तीव्रता के भूकंप जितनी ऊर्जा छोड़ सकता है।

इतिहास और 'सीस्मिक गैप' क्यों मायने रखता है

उत्तराखंड भूकंपों के लिए नया नहीं है। 1 सितंबर 1803 को गढ़वाल में आया विनाशकारी भूकंप (अनुमानित तीव्रता 7.5–8.0) ने बद्रीनाथ मंदिर समेत बड़े इलाके को हिला दिया था। 20 अक्टूबर 1991 को उत्तरकाशी में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया, और 29 मार्च 1999 को चमोली में लगभग 6.8 तीव्रता का झटका लगा।

लेकिन भूवैज्ञानिकों की असली चिंता की जड़ कुछ और है — "सेंट्रल हिमालयन सीस्मिक गैप"। इस पूरे क्षेत्र में 200 से ज्यादा वर्षों से कोई बड़ा भ्रंश-टूटन (मेजर रप्चर) नहीं हुआ है। जितना लंबा अंतराल, उतना ज्यादा जमा तनाव — यही वजह है कि यह अध्ययन महत्वपूर्ण है।

डरने की नहीं, तैयार रहने की बात

यहां ठहरकर सोचना जरूरी है: यह अध्ययन चेतावनी नहीं, जानकारी है। वैज्ञानिक दशकों से कह रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्र में बड़ा भूकंप संभव है — नया शोध सिर्फ यह बताता है कि उत्तराखंड के नीचे तनाव कहां और कितनी तेजी से जमा हो रहा है। इसका मतलब घबराहट नहीं, बल्कि तैयारी है: भूकंप-रोधी भवन नियमों का पालन, स्कूलों और दफ्तरों में मॉक ड्रिल, और आपात योजनाओं की समीक्षा।

प्राकृतिक आपदाओं में तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव है — चाहे वह तमिलनाडु में भारी बारिश जैसे मौसम अलर्ट के समय सतर्कता हो या सड़क हादसों जैसी आपात स्थितियों में त्वरित मदद। हिमालयी राज्यों के लिए भूकंप-तैयारी अब वैकल्पिक नहीं, जरूरी है।

मूल रिपोर्टें: NDTV Profit की रिपोर्ट | Business Today की रिपोर्ट

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