अस्पतालों में एक बार इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरणों को दोबारा इस्तेमाल करने पर अब सख्ती बढ़ गई है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) ने 16 अक्टूबर 2026 के एक पत्र में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में सिंगल-यूज मेडिकल उपकरणों और डिस्पोजेबल सर्जिकल सामान के दोबारा इस्तेमाल पर लगे प्रतिबंध को सख्ती से लागू करें। यह निर्देश 24 अक्टूबर 2026 को पीटीआई की खबर के जरिए सामने आया है।
यह मुद्दा सीधे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा है। एक बार इस्तेमाल के लिए बने उपकरण को दोबारा इस्तेमाल करने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है, और यही वजह है कि स्वास्थ्य अधिकारियों ने इस पर सख्त रुख अपनाया है।
डीजीएचएस ने क्या निर्देश दिया है
डीजीएचएस के निर्देश के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी सार्वजनिक या निजी अस्पताल में एक बार इस्तेमाल वाले उपकरणों का दोबारा प्रयोग न हो। निर्देश में संक्रमण के खतरे, मरीजों की सुरक्षा, संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण, नियामक अनुपालन और स्वास्थ्य खर्च जैसे कारणों का हवाला दिया गया है।
डीजीएचएस के संज्ञान में यह आया था कि कुछ निजी और कॉरपोरेट अस्पताल एक बार इस्तेमाल वाले उपकरणों को स्टेरलाइज करके दोबारा इस्तेमाल कर रहे थे। यह प्रथा विशेष रूप से कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी तथा न्यूरोसर्जरी जैसे विभागों में देखी गई थी। इन विभागों में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बेहद संवेदनशील होते हैं, इसलिए इनमें दोबारा इस्तेमाल का खतरा और भी गंभीर माना जाता है।
कौन-से उपकरण दोबारा इस्तेमाल हो रहे थे
रिपोर्टों के अनुसार, जिन उपकरणों के दोबारा इस्तेमाल की बात सामने आई है, उनमें कार्डियक कैथेटर, गाइडवायर, बैलून और एब्लेशन कैथेटर, इंट्रोड्यूसर शीथ, डायलिसिस उपकरण जैसे डायलाइजर और ब्लड ट्यूबिंग, सर्जिकल स्टेपलर, लैप्रोस्कोपिक ट्रोकार और ऑर्थोपेडिक ड्रिल बिट शामिल हैं। एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (एआईएमईडी) के अनुसार, सिरिंज और सुई भी उन सामानों में पहचानी गई हैं, जिनके दोबारा इस्तेमाल की बात सामने आई है।
मरीजों पर क्या असर पड़ रहा था
डीजीएचएस ने कुछ ऐसे मामलों की ओर भी ध्यान दिलाया है, जिनमें कथित तौर पर मरीजों से दोबारा इस्तेमाल किए गए उपकरणों की पूरी कीमत वसूली गई, या फिर उनकी कीमत सरकारी अधिकारियों से प्रतिपूर्ति के रूप में ली गई। यह बात यहां स्पष्ट रूप से दर्ज करना जरूरी है कि यह डीजीएचएस की ओर से उठाया गया आरोप है, जिसे कथित के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए।
यदि यह आरोप सही है, तो यह मरीजों के साथ दोहरी अन्याय की स्थिति बनाता है — एक ओर संक्रमण और सुरक्षा का खतरा, और दूसरी ओर नए उपकरण की पूरी कीमत चुकाना। यही वजह है कि इस निर्देश में नियामक अनुपालन और स्वास्थ्य खर्च दोनों का जिक्र किया गया है। स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता के लिहाज से भी यह पहलू महत्वपूर्ण है, जैसा कि कैंसर की दवाओं की कीमतों में कटौती और एनएमसी के मर्सी अटेम्प्ट जैसे स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में भी देखा गया है।
स्टेरलाइजेशन के बाद भी दोबारा इस्तेमाल क्यों असुरक्षित है
डीजीएचएस के अनुसार, स्टेरलाइजेशन के बाद भी एक बार इस्तेमाल के लिए डिजाइन किए गए उपकरण दोबारा इस्तेमाल के लिए सुरक्षित नहीं हो सकते। इसकी वजह यह है कि अपर्याप्त रीप्रोसेसिंग या उपकरण के खराब होने से उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और जैविक सामग्री पीछे रह सकती है। सरल शब्दों में, एक बार इस्तेमाल के लिए बना उपकरण दूसरी बार उसी तरह काम नहीं कर सकता, चाहे उसे कितनी भी अच्छी तरह साफ किया जाए।
मरीजों के लिए इसका क्या मतलब है
इस निर्देश का सबसे सीधा मतलब यह है कि अस्पतालों को अब सिंगल-यूज उपकरणों के इस्तेमाल में और अधिक जवाबदेह होना होगा। मरीजों को भी यह जानने का अधिकार है कि उनके इलाज में इस्तेमाल होने वाला उपकरण नया है या नहीं, और इसके लिए वे अस्पताल से सवाल पूछ सकते हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ने से मरीजों का भरोसा भी मजबूत होगा।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अब इस निर्देश को जमीनी स्तर पर लागू करना होगा, जिसमें अस्पतालों की निगरानी, शिकायतों की जांच और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई शामिल हो सकती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह निर्देश अस्पतालों की कार्यप्रणाली में कितना बदलाव लाता है। इस खबर के स्रोतों के अनुसार पूरी जानकारी एबीपी लाइव और मिलेनियम पोस्ट की रिपोर्टों में दी गई है।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी है, चिकित्सा सलाह नहीं।
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