नई दिल्ली में शनिवार, 31 अक्टूबर को विपक्षी इंडिया गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की प्रतीकात्मक 'जनता की अदालत' लगाई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के राजाजी मार्ग स्थित आवास पर हुए इस कार्यक्रम में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अध्यक्षता की, जबकि समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद और तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय उपाध्यक्ष की भूमिका में रहे।
रिपोर्टों के अनुसार, खरगे ने इस मौके पर एक प्रस्ताव पढ़ा, जिसमें सीईसी को हटाने और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग की गई। यह प्रस्ताव गठबंधन के सांसदों की ओर से रखा गया बताया गया है। कार्यक्रम में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, जयराम रमेश और केसी वेणुगोपाल समेत कई नेता मौजूद रहे।
छह आरोप क्या हैं?
खरगे की ओर से पेश प्रस्ताव में सीईसी के खिलाफ छह आरोप गिनाए गए। पहला आरोप यह है कि उन्होंने भाजपा के पक्ष में राष्ट्रीय और राज्य चुनावों को प्रभावित करने की कथित साजिश में भाग लिया। दूसरा आरोप 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने का है — यह गठबंधन का आरोप है, चुनाव आयोग का स्थापित तथ्य नहीं।
अन्य आरोपों में संसद की मंजूरी के बिना फॉर्म 6 को दोबारा लिखना, ईसीआईएनईटी के जरिए मतदाता सूचियों पर नियंत्रण, अन्य दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम करना शामिल है। खरगे ने यह भी कहा कि सीईसी को हटाने, 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को निरस्त करने और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को समाप्त करने की मांग की जाती है।
यह कार्यक्रम प्रतीकात्मक क्यों है?
यह समझना जरूरी है कि शनिवार की कार्यवाही प्रतीकात्मक थी — इससे सीईसी को संवैधानिक रूप से हटाया नहीं जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सीईसी को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पर लागू होती है, यानी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
रिपोर्टों के अनुसार, विपक्ष ने 12 मार्च 2026 को सीईसी को हटाने के नोटिस दिए थे — लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर से — लेकिन 6 अप्रैल को दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने उन्हें खारिज कर दिया था। इसलिए शनिवार का कार्यक्रम एक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन था, कानूनी कार्यवाही नहीं।
चुनाव आयोग का पक्ष और सरकार की प्रतिक्रिया
चुनाव आयोग ने अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में कहा था कि एसआईआर से जुड़े फैसले आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से लिए थे। यह जवाब गठबंधन के दो आरोपों — एकतरफा फैसले और मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में बदलाव — को सीधे चुनौती देता है।
दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने शनिवार को कांग्रेस से चुनावी हारों पर सवाल पूछे और चुनाव आयोग की आलोचना को संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश बताया। यानी दोनों पक्षों की दलीलें अब जनता के सामने हैं, और फैसला राजनीतिक मैदान में होगा।
आगे क्या: 1 नवंबर की रैली
यह कार्यक्रम मूल रूप से शुक्रवार, 30 अक्टूबर को होना था, लेकिन दिल्ली में बारिश के कारण इसे एक दिन टाल दिया गया। खरगे के आवास के लॉन में पानी भर गया था, इसलिए वरिष्ठ नेताओं की सुविधा को देखते हुए कार्यक्रम शनिवार को हुआ।
अब अगला चरण रविवार, 1 नवंबर को है, जब इंडिया गठबंधन दिल्ली में 'चलो दिल्ली' मार्च और रामलीला मैदान में रैली करेगा। रिपोर्टों के अनुसार, मार्च दोपहर 12 बजे मिंटो रोड-कनॉट प्लेस जंक्शन से शुरू होकर रामलीला मैदान तक जाएगा। इस रैली में एसआईआर और मतदाता सूची के मुद्दे पर विपक्ष की आगे की रणनीति साफ होगी।
मूल स्रोत: द प्रिंट (पीटीआई) और सियासत। संबंधित: एसआईआर की समयसीमा छह राज्यों में बढ़ी और इंडिया गठबंधन का सीईसी कार्यक्रम: पूर्वावलोकन।
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