केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति परकाला प्रभाकर 23 अक्टूबर को होने वाले एसआईआर विरोधी मार्च में शामिल होंगे — यह वही प्रदर्शन है जो चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बुलाया गया है। एक अर्थशास्त्री और टिप्पणीकार के रूप में जाने जाने वाले प्रभाकर का इस मंच पर आना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि उनकी पत्नी केंद्र सरकार में वित्त मंत्रालय संभालती हैं। ध्यान रहे: यह मार्च अभी हुआ नहीं है — 23 अक्टूबर को प्रस्तावित है, इसलिए यहां दी गई सारी जानकारी आयोजकों की घोषणाओं पर आधारित है।
कौन बुला रहा है यह मार्च
यह प्रदर्शन "पीपल अगेंस्ट एसआईआर" (People Against SIR) नाम के गठबंधन ने बुलाया है, जिसका गठन 14 अक्टूबर को हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें छात्र, युवा, किसान, मजदूर, महिला संगठन, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, दिव्यांगजन और ट्रांसजेंडर समूह शामिल हैं। गठबंधन ने 23 अक्टूबर को "जनता मार्च" की घोषणा की है, जिसका मकसद "लोकतंत्र बहाल करना और पूरे देश में जंतर-मंतर बनाना" बताया गया है। उनका नारा है — "हर हाथ में तिरंगा, हर गली में जंतर मंतर"।
गठबंधन ने इंडिया ब्लॉक के दलों से भी इस मार्च में शामिल होने की अपील की है। यानी यह सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि विपक्षी एकजुटता की परीक्षा भी है।
(मंच पर आने वाले अभिजीत दीपके के बारे में यहाँ पढ़ें — उन्हें हाल ही में प्रिवेंटिव गिरफ्तारी में लिया गया था।)
क्या हैं मुख्य मांगें
आयोजकों की घोषित मांगें तीन हैं: मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए और उन पर मुकदमा चलाया जाए; मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को रद्द किया जाए; और जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें बहाल किया जाए। एसआईआर को लेकर विवाद इस आरोप पर टिका है कि मतदाता सूचियों से नामों को लक्षित तरीके से हटाया जा रहा है — आयोजकों का कहना है कि यह प्रक्रिया लोगों को मताधिकार से वंचित करती है।
प्रभाकर का तीखा बयान
परकाला प्रभाकर ने एसआईआर को "नागरिकता का रक्तहीन राजनीतिक नरसंहार" (bloodless political genocide of citizenship) बताया है। रिपोर्टों के अनुसार, उनका तर्क है कि मतदाता सूची से नामों को लक्षित ढंग से हटाना लोगों को नागरिकता के मूल अधिकार से वंचित करने जैसा है। यह बयान बेहद तीखा है — और इसीलिए चर्चा में है कि वित्त मंत्री के पति खुद चुनाव आयोग के खिलाफ बने मंच पर खड़े होंगे।
यहां एक बारीक अंतर समझना जरूरी है: प्रभाकर सरकार के मंत्री नहीं हैं, न ही वह भाजपा के पदाधिकारी हैं। वह एक स्वतंत्र अर्थशास्त्री और लेखक के रूप में जाने जाते हैं, जो पहले भी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना कर चुके हैं। उनका इस मार्च में शामिल होना व्यक्तिगत राजनीतिक रुख है — लेकिन सार्वजनिक धारणा में यह सरकार के भीतर मतभेद जैसा भी पढ़ा जा सकता है। यही इस खबर का सबसे संवेदनशील पहलू है।
मंच पर कौन-कौन होगा
रिपोर्टों के अनुसार, 23 अक्टूबर के मंच पर प्रभाकर के साथ अभिनेता प्रकाश राज, वकील प्रशांत भूषण, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके, एआईएसयू अध्यक्ष नेहा बोरा, किसान नेता राकेश टिकैत, तुषार गांधी और आइशी घोष जैसे नाम शामिल हो सकते हैं। यह सूची आयोजकों की घोषणा पर आधारित है — कार्यक्रम के दिन वास्तविक उपस्थिति में बदलाव संभव है।
कुल मिलाकर, 23 अक्टूबर का यह मार्च एसआईआर विवाद को सड़कों पर ले जाने की सबसे बड़ी कोशिशों में से एक होगा। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने लोग जुटेंगे, बल्कि यह है कि क्या यह आंदोलन चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे व्यापक विरोध को एकजुट मंच दे पाएगा — और क्या सत्तापक्ष इसे नजरअंदाज कर पाएगा।
सूत्र: एबीपी न्यूज़, फ्री प्रेस जर्नल
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