ISRO to Launch NVS-03 on October 30: How India's Own NavIC System Gets Its Strength Back

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 30 अक्टूबर 2026 की रात 11:51 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपना नया नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 लॉन्च करेगा। यह उपग्रह जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट से भेजा जाएगा और भारत की अपनी क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली नविक को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

एनवीएस-03 दूसरी पीढ़ी के नविक उपग्रहों की श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। इसरो की योजना के अनुसार एनवीएस-01 से एनवीएस-05 तक पांच दूसरी पीढ़ी के उपग्रह मौजूदा नविक तंत्र को और सक्षम बनाएंगे, ताकि नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता बनी रहे। एनवीएस-01 को 29 मई 2023 को जीएसएलवी-एफ12 से लॉन्च किया गया था, और उसी मिशन में पहली बार स्वदेशी परमाणु घड़ी उड़ाई गई थी।

श्रीहरिकोटा से रात में उड़ान भरते रॉकेट और भारत के ऊपर नेविगेशन उपग्रह का प्रतीकात्मक चित्रण


एनवीएस-03 में क्या खास है

रिपोर्टों के अनुसार एनवीएस-03 में स्वदेशी परमाणु घड़ी के साथ-साथ खरीदी गई परमाणु घड़ियां भी लगी हैं। उपग्रह की सटीक समय-गणना ही नेविगेशन की जान होती है — घड़ी में जरा सी चूक का मतलब है स्थान की गणना में बड़ी गलती। पुराने नविक उपग्रहों में आयातित परमाणु घड़ियों की खराबी एक बड़ी समस्या रही है, इसलिए स्वदेशी घड़ी को इस मिशन की सबसे अहम तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है।

इसके अलावा एनवीएस-03 में मौजूदा एल5 और एस बैंड के साथ एल1 बैंड भी जोड़ा गया है। एल1 बैंड आम उपभोक्ता उपकरणों के साथ बेहतर अनुकूलता देता है, जिससे मोबाइल फोन जैसे रोजमर्रा के उपकरणों में नविक आधारित सेवाओं का इस्तेमाल आसान हो सकता है। उपग्रह भारत के भूभाग और उसकी सीमा से करीब 1,500 किलोमीटर दूर तक के क्षेत्र में स्थिति, वेग और समय की सेवा देगा।

नविक क्यों जरूरी है

नविक — नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन — भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली है। यह अमेरिका के जीपीएस जैसी वैश्विक प्रणालियों पर निर्भरता कम करती है। नविक दो तरह की सेवाएं देता है: आम उपयोगकर्ताओं के लिए मानक स्थिति सेवा और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा। नागरिक उपयोग के साथ-साथ यह प्रणाली सशस्त्र बलों के लिए रणनीतिक रूप से भी अहम है, क्योंकि युद्ध या संकट के समय किसी दूसरे देश की प्रणाली पर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है।

नविक की कहानी 1999 के कारगिल संघर्ष से जुड़ी है, जब भारत को यह अहसास हुआ कि उसे अपनी नेविगेशन प्रणाली चाहिए। सात उपग्रहों वाले इस तंत्र को धीरे-धीरे बनाया गया, लेकिन पुराने उपग्रहों के बूढ़े होने, परमाणु घड़ियों की खराबी और एनवीएस-02 की असफलता ने इसे कमजोर कर दिया।

एनवीएस-02 की असफलता के बाद वापसी की कोशिश

जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ एनवीएस-02 जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा तक तो पहुंच गया, लेकिन प्रणोदन प्रणाली की तकनीकी खराबी के कारण उसे तय कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका। रिपोर्टों के अनुसार इसके बाद नविक तंत्र में स्वतंत्र रूप से त्रि-आयामी स्थिति बताने के लिए जरूरी कम से कम चार उपग्रहों की संख्या से कम उपग्रह काम कर रहे थे — कहा गया कि सिर्फ तीन उपग्रह स्थिति, वेग और समय की सेवा दे पा रहे थे।

यही वजह है कि एनवीएस-03 को सिर्फ एक और लॉन्च नहीं, बल्कि नविक की स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण क्षमता बहाल करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यह भी सच है कि सिर्फ सफल लॉन्च ही काफी नहीं होगा — उपग्रह को तय कक्षा में स्थापित करना, उसकी जांच करना और उसे चालू करना भी उतना ही जरूरी होगा।

आम आदमी को क्या फायदा

अगर यह मिशन सफल रहता है, तो लंबे समय में इसका फायदा आम उपयोगकर्ताओं को भी मिलेगा। एल1 बैंड के जुड़ने से स्मार्टफोन और अन्य उपकरणों में नविक का इस्तेमाल बढ़ सकता है, जिससे भारत के भीतर और आसपास के क्षेत्र में ज्यादा सटीक नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, परिवहन और कृषि जैसे कामों में मदद मिलेगी। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अंतरिक्ष क्षेत्र का एक और कदम होगा — अपनी आंखों से, अपनी घड़ी से, अपनी दिशा खुद तय करने की क्षमता।

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स्रोत: द इकोनॉमिक टाइम्स और इंडिया टीवी की रिपोर्टों के अनुसार।

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