Tamil Nadu Hikes Police Station Funds 8 Times: ₹71 Crore Push Against Petty Corruption

एक पुलिस थाने में अगर स्टेशनरी खत्म हो जाए या कर्मचारियों के लिए चाय तक का पैसा न हो, तो होता क्या है? तमिलनाडु में इसका जवाब लंबे समय से कड़वा रहा है — रिपोर्टों के अनुसार, थानों के कर्मचारी मामूली खर्च पूरे करने के लिए शिकायतकर्ताओं और पीड़ितों से पैसे लेने को मजबूर होते थे। अब मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार ने इसी जड़ पर प्रहार किया है। 21 अक्टूबर 2026 को गृह विभाग के जारी आदेश के तहत थानों के मासिक आकस्मिक फंड (contingency fund) में 6 से 8 गुना तक की बढ़ोतरी की गई है, जिस पर सालाना ₹71.01 करोड़ का अतिरिक्त खर्च आएगा।

तमिलनाडु के एक पुलिस थाने का चित्रण — भवन के सामने तिरंगा और ₹71.01 करोड़ के फंड बढ़ोतरी की घोषणा को दर्शाती कलाकृति


कितना फंड, किस थाने को

तमिलनाडु के थानों को उनके यहाँ दर्ज अपराधों की संख्या के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। नई व्यवस्था के तहत हल्के (light) थानों का मासिक फंड ₹3,750 से बढ़कर ₹30,000 होगा, मध्यम (medium) थानों का ₹6,000 से ₹40,000 और भारी (heavy) थानों का ₹8,250 से ₹50,000 हो जाएगा। यानी कुछ श्रेणियों में यह बढ़ोतरी पूरी 8 गुना है।

राज्य में 1,169 हल्के थाने हैं — इनमें सभी महिला थाने और ट्रैफिक थाने भी शामिल हैं — जबकि 353 मध्यम और 395 भारी थाने हैं, जिनमें मेट्रो-1 और मेट्रो-2 श्रेणी के थाने आते हैं। मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में गृह विभाग की अनुदान मांगों के दौरान यह घोषणा की थी और कहा था कि इसका उद्देश्य न सिर्फ अचानक आने वाले खर्चे पूरे करना है, बल्कि भ्रष्टाचार को खत्म करना भी है।

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छोटे खर्च, बड़ा भ्रष्टाचार — असली तंत्र क्या है

यह कहानी दरअसल पैसे की नहीं, मजबूरी की है। रिपोर्टों के अनुसार, पहले के फंड से स्टेशनरी और उपभोग्य सामान जैसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं होती थीं — चाय तक के लिए पैसा नहीं होता था। नतीजा यह होता था कि कर्मचारियों को शिकायतकर्ताओं, पीड़ितों और याचिकाकर्ताओं से पैसे लेने पड़ते थे। वरिष्ठ अधिकारियों ने लंबे समय से इस समस्या की ओर इशारा किया था। यानी तथाकथित 'छोटा भ्रष्टाचार' अक्सर निजी लालच नहीं, बल्कि संस्थागत कमी का परिणाम था।

सरकार का तर्क साफ है: जब थाने के पास अपने बुनियादी खर्च का पैसा होगा, तो कर्मचारियों को जनता से पैसे मांगने का बहाना नहीं मिलेगा। यह नीति भ्रष्टाचार को डंडे से नहीं, व्यवस्था से मारने की कोशिश है — और इसी वजह से यह पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है।

विशेष इकाइयों की अनदेखी क्यों

लेकिन इस आदेश की एक अजीब सच्चाई भी सामने आई है। सीबी-सीआईडी, ईओडब्ल्यू, एटीएस, क्यू ब्रांच, साइबर क्राइम, तटीय सुरक्षा और मूर्ति विंग जैसी विशेष इकाइयों — जिनके पास थानों जैसी ही शक्तियां हैं — को फिलहाल कोई आकस्मिक फंड नहीं मिलता। राज्य पुलिस प्रमुख से इन इकाइयों के लिए ₹30,000 प्रति माह के फंड का प्रस्ताव भेजने को कहा गया है। यानी एक तरफ थानों का फंड 8 गुना बढ़ रहा है, दूसरी तरफ अपराध की सबसे जटिल जांच करने वाली इकाइयां अभी भी फंड से वंचित हैं — यह वह अधूरा हिस्सा है जिस पर सरकार की नजर बनी रहनी चाहिए।

पुलिस स्मृति दिवस पर शहीदों को नमन

उसी दिन मुख्यमंत्री विजय ने चेन्नई के डीजीपी कार्यालय स्थित पुलिस स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की — 21 अक्टूबर पुलिस स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनके साथ डीजीपी महेश कुमार अग्रवाल भी मौजूद थे। सरकार ने कर्तव्य पालन के दौरान जान गंवाने वाले 6 पुलिसकर्मियों और घायल हुए एक अधिकारी के परिवारों को कुल ₹5.96 करोड़ की वित्तीय सहायता भी वितरित की।

फंड बढ़ोतरी और शहीदों के परिवारों की मदद — दोनों मिलकर एक संदेश देते हैं: पुलिस व्यवस्था को मजबूत करना सिर्फ उपकरण और भवनों से नहीं, बल्कि थाने की रोजमर्रा की जरूरतों और कर्मचारियों के सम्मान से होता है। अब देखना यह होगा कि ₹71 करोड़ का यह निवेश थानों के भीतर की संस्कृति को कितना बदल पाता है।

सूत्र: द हिंदू, डीटी नेक्स्ट

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