केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन में यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स पर तीखा हमला बोला है। 22 अक्टूबर को बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में उन्होंने कहा कि इस्पात पर लगाए जा रहे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) के जरिए यूरोप 'विनाश को निमंत्रण' दे रहा है — इससे यूरोप में जीवन-यापन की लागत बढ़ेगी और उसका उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएगा।
<बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में गोयल ने क्या कहा
रिपोर्टों के अनुसार गोयल ने मंच से कहा कि दुनिया की केवल 17 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत का हिस्सा 3 प्रतिशत से भी कम है, जबकि यूरोप का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भारत से 7 से 8 गुना अधिक है। यानी जलवायु संकट की जिम्मेदारी में भारत का योगदान ऐतिहासिक रूप से काफी कम रहा है — यह भारत सरकार का लंबे समय से चला आ रहा तर्क है।
इसी संदर्भ में उन्होंने CBAM पर निशाना साधा। रिपोर्टों के अनुसार गोयल ने कहा कि इस्पात जैसे उत्पादों पर कार्बन टैक्स लगाने का मतलब है कि यूरोप 'विनाश को निमंत्रण' (inviting disaster) दे रहा है — स्टील महंगा होने से यूरोप में निर्माण और विनिर्माण की लागत बढ़ेगी, आम लोगों का जीवन महंगा होगा, और यूरोपीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाएगा।
CBAM असल में है क्या
CBAM यानी कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म — यूरोपीय संघ का वह नियम जिसके तहत इस्पात जैसे कार्बन-गहन (carbon-intensive) उत्पादों के यूरोप में आयात पर कार्बन मूल्य वसूला जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो यूरोप को इस्पात बेचने वाले निर्यातकों को अपने उत्पाद में निहित कार्बन उत्सर्जन का हिसाब चुकाना पड़ता है, जिससे यूरोपीय बाजार में उस इस्पात की प्रभावी कीमत बढ़ जाती है।
गोयल का तर्क है कि इससे यूरोप को ही नुकसान होगा — स्टील महंगा होने से यूरोप में निर्माण और विनिर्माण की लागत बढ़ेगी, जिसका बोझ अंततः यूरोपीय उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। यानी उनके अनुसार यह नीति न तो विकासशील देशों के निर्यातकों के लिए उचित है, न ही यूरोप के लिए फायदेमंद।
भारतीय इस्पात निर्यातकों के लिए इसका क्या मतलब है
भारत के नजरिए से यह मुद्दा सीधा आर्थिक है। यूरोप को इस्पात निर्यात करने वाले भारतीय उत्पादकों को CBAM के तहत अतिरिक्त कार्बन लागत चुकानी पड़ती है, जिससे यूरोपीय बाजार में उनकी कीमत-प्रतिस्पर्धा पर दबाव पड़ता है। रिपोर्टों के अनुसार यही कारण है कि भारत इस मुद्दे को व्यापार वार्ताओं में प्रमुखता से उठा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि गोयल ने इस बहस को केवल भारत के हित तक सीमित नहीं रखा — उन्होंने कहा कि CBAM यूरोप के अपने उद्योग और उपभोक्ताओं के लिए भी हानिकारक है। यानी उनका संदेश दोहरा था: यह नीति न तो विकासशील देशों के लिए उचित है, न ही यूरोप के लिए फायदेमंद।
दौरे की बड़ी तस्वीर: FTA, औद्योगिक सहयोग और इंडिया सेंटर
गोयल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत चल रही है। जर्मन मंत्री कैथरीना राइखे के साथ उनकी मुलाकात में भारत-ईयू FTA और औद्योगिक सहयोग प्रमुख एजेंडा रहे — रिपोर्टों के अनुसार दोनों पक्षों ने व्यापारिक रिश्तों को और गहरा करने पर जोर दिया।
इसके अलावा बर्लिन में DGAP के 'इंडिया सेंटर' का उद्घाटन किया गया, जो दोनों देशों के बीच नीति-संवाद और शोध सहयोग को बढ़ावा देगा। कुल मिलाकर छह दिवसीय यह दौरा व्यापार वार्ता और जलवायु-व्यापार नीति — दोनों मोर्चों पर भारत की स्थिति को स्पष्ट करने वाला साबित हो रहा है।
व्यापार समझौतों की दिशा में भारत-न्यूज़ीलैंड FTA और सेब-कीवी पर टैरिफ कोटा पर हमारी रिपोर्ट भी पढ़ें, और बाजार की चाल के लिए सेंसेक्स में 460 अंकों की गिरावट की खबर देखें।
मूल रिपोर्टें The Hindu BusinessLine और Republic World पर पढ़ें।
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