Bengaluru Police Bust Illegal SIM Box Network Linked to Digital-Arrest Scams: 10 Devices Seized

बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड इलाके में पुलिस ने साइबर ठगी के एक बड़े नेटवर्क पर छापा मारा है। कर्नाटक साइबर कमांड की टीम ने दो अपार्टमेंट से 10 अवैध सिम बॉक्स (जीएसएम गेटवे) डिवाइस बरामद किए हैं, जिनकी कुल क्षमता 320 सिम कनेक्शन तक की है। रिपोर्टों के अनुसार, यह नेटवर्क देशभर में 'डिजिटल अरेस्ट' ठगी, सेक्सटॉर्शन और वित्तीय साइबर अपराधों से जुड़ा हो सकता है।

कर्नाटक के डीजीपी साइबर कमांड प्रणब मोहंती ने 22 अक्टूबर को जारी प्रेस नोट में कार्रवाई की जानकारी दी। पुलिस के अनुसार, काडुगोडी के एक अपार्टमेंट से 6 और पट्टंदुर अग्रहारा के दूसरे अपार्टमेंट से 4 सिम बॉक्स डिवाइस मिले। जांच में दोनों ठिकानों को एक हीरोपी नेटवर्क द्वारा चलाया जा रहा था। साथ ही महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के तिरोड़ा से 4 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिन पर सिम कार्ड की सप्लाई और उन्हें ई-सिम प्रोफाइल में बदलने का आरोप है।


बेंगलुरु सिम बॉक्स छापेमारी का सिनेमैटिक कंसेप्ट चित्र — सबूत टेबल पर जीएसएम गेटवे डिवाइस, बिखरे सिम कार्ड और पृष्ठभूमि में पुलिस टेप के साथ।

शिकायत से छापेमारी तक — कैसे खुला मामला

रिपोर्टों के अनुसार, यह कार्रवाई भारती एयरटेल के मुख्य सर्किल नोडल अधिकारी की शिकायत पर शुरू हुई। शिकायत में व्हाइटफील्ड और काडुगोडी इलाकों में एयरटेल सिम कार्डों के सिम बॉक्स सेटअप में अनधिकृत इस्तेमाल की आशंका जताई गई थी। इसी शिकायत के आधार पर व्हाइटफील्ड साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन ने 26 अगस्त 2026 को क्राइम नंबर 286/2026 दर्ज किया और दूरसंचार विभाग (डॉट) कर्नाटक के साथ मिलकर विशेष अभियान चलाया।

जांच के दौरान पुलिस ने दोनों ठिकानों की पहचान की। काडुगोडी से बरामद 6 डिवाइसों में कुल 192 स्लॉट थे, जो विभिन्न टेलीकॉम कंपनियों के ई-सिम कनेक्शनों से जुड़े थे। पट्टंदुर अग्रहारा से मिले 4 डिवाइसों में 128 स्लॉट थे। इस तरह कुल क्षमता 320 सिम कनेक्शन की थी। पुलिस के अनुसार जब्त डिवाइस जांच के अधीन हैं, ताकि उनकी सटीक भूमिका तय हो सके।

आखिर सिम बॉक्स होता क्या है? ठग इसका इस्तेमाल क्यों करते हैं

सिम बॉक्स असल में एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होता है, जिसे जीएसएम गेटवे भी कहते हैं। इसमें एक साथ दर्जनों सिम कार्ड लग सकते हैं — इस मामले में हर डिवाइस में 32 स्लॉट थे। आम तौर पर ऐसे डिवाइस का इस्तेमाल बल्क एसएमएस या कॉल सेंटरों के लिए होता है, लेकिन ठग इसका दुरुपयोग करते हैं। तकनीक के सकारात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से इंडिया एआई फैलोशिप जैसी पहलें भी चलाई जा रही हैं — मगर यही तकनीक गलत हाथों में ठगी का हथियार बन जाती है।

ठग एक ही डिवाइस से सैकड़ों कॉल एक साथ चला सकते हैं, कॉलर आईडी बदल सकते हैं और हर कॉल के बाद नंबर बदलकर पकड़ से बच सकते हैं। यही वजह है कि 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी ठगी में पीड़ितों को अज्ञात नंबरों से बार-बार कॉल आते हैं। रिपोर्टों के अनुसार इस नेटवर्क में ई-सिम प्रोफाइल का इस्तेमाल भी किया जा रहा था, जिससे असली सिम कार्ड रखे बिना ही कनेक्शन चालू रखे जा सकें।

डिजिटल अरेस्ट ठगी से क्या कनेक्शन?

रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस को शक है कि यह नेटवर्क डिजिटल अरेस्ट घोटालों, सेक्सटॉर्शन और अन्य वित्तीय साइबर अपराधों से जुड़ा है। डिजिटल अरेस्ट में ठग खुद को सीबीआई, पुलिस या कोर्ट का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर पीड़ित को डराते हैं और पैसों की मांग करते हैं। हाल ही में मुंबई पुलिस के ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को भेजे गए नोटिस भी इसी बड़े मुहिम का हिस्सा हैं, जिसमें कानून प्रवर्तन एजेंसियां डिजिटल अपराध पर नकेल कस रही हैं।

पुलिस के शुरुआती अनुमान के अनुसार, इस नेटवर्क का कथित वित्तीय लेन-देन 'सैकड़ों करोड़ रुपये' तक हो सकता है — लेकिन पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि पीड़ितों की वास्तविक संख्या, हुए नुकसान और नेटवर्क का पूरा दायरा अभी स्थापित नहीं हुआ है, और जांच जारी है। यह जानकारी पीटीआई की खबर (रेडिफ पर प्रकाशित) और साउथ फर्स्ट की कवरेज पर आधारित है।

इससे हमें क्या सीखना चाहिए

यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराध अब संगठित इंफ्रास्ट्रक्चर पर चल रहा है — दो फ्लैट, 320 लाइनें, और महाराष्ट्र से जुड़ी सप्लाई चेन। अच्छी बात यह है कि एयरटेल के नोडल अधिकारी की शिकायत ने मामला खोला — यानी टेलीकॉम कंपनियां और पुलिस अब मिलकर काम कर रही हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सबक आम लोगों के लिए है: भारत की कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती। ऐसा कॉल आए तो डरें नहीं — तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर रिपोर्ट करें। तकनीक और साइबर सुरक्षा से जुड़ी ऐसी ही अहम खबरों के लिए Global Insight को फॉलो करते रहें।

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