बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए आज (23 अक्टूबर) सुबह 8 बजे से मतदान हो रहा है। शाम 4 बजे तक चलने वाले इस मतदान में 150 उम्मीदवार मैदान में हैं — और यह कोई आम चुनाव नहीं है।
इन सीटों पर वोट डालने का हक सिर्फ स्नातकों और शिक्षकों को है। 933 मतदान केंद्रों पर 5,32,847 पंजीकृत मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनेंगे। वोटों की गिनती 27 अक्टूबर को होगी और पूरी चुनाव प्रक्रिया 31 अक्टूबर तक समाप्त हो जाएगी।
मुकाबला त्रिकोणीय है — सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए), विपक्षी महागठबंधन और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी। रिपोर्टों के अनुसार चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों (पटना, दरभंगा, तिरहुत, कोसी) में 90 उम्मीदवार और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों (पटना, दरभंगा, तिरहुत, सारण) में 60 उम्मीदवार मैदान में हैं।
पटना स्नातक सीट: सबसे चर्चित मुकाबला
सबसे ज्यादा नजर पटना स्नातक सीट पर है। जनता दल-यूनाइटेड (जद-यू) ने अपने वर्तमान सदस्य नीरज कुमार को फिर से उतारा है — वे लगातार चौथी बार जीत की तलाश में हैं।
उनके सामने तीन दावेदार हैं: जन सुराज पार्टी के अनुज सिंह, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के दिलीप कुमार और कांग्रेस के असदुल्लाह खान। इसी सीट पर जद-यू के ही विधायक अनंत सिंह ने पार्टी लाइन तोड़कर जन सुराज के अनुज सिंह का खुला समर्थन किया है — यही विवाद पूरे प्रचार अभियान की सबसे बड़ी चर्चा रहा।
प्रचार 21 अक्टूबर शाम 5 बजे थम गया था। प्रचार के दौरान नीरज कुमार की तबीयत बिगड़ने की खबर भी आई; नेशन प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उपमुख्यमंत्री समेत पार्टी के शीर्ष नेताओं ने अस्पताल जाकर उनकी सेहत की जानकारी ली।
सारण शिक्षक सीट: बगावत, फिर समझौता
एनडीए को दूसरी मुश्किल सारण शिक्षक सीट पर आई। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोम) के तत्कालीन महासचिव राम पुकार सिन्हा ने 5 अक्टूबर को निर्दलीय नामांकन दाखिल किया, जबकि एनडीए का आधिकारिक उम्मीदवार जद-यू के आनंद पुष्कर हैं। नामांकन के समय पार्टी के तीन विधायक उनके साथ खड़े थे। पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निलंबित कर दिया।
16 अक्टूबर को समीकरण बदला — सिन्हा ने सक्रिय चुनाव-प्रचार से हटकर आनंद पुष्कर के समर्थन की घोषणा कर दी। नामांकन वापसी की अंतिम तिथि (9 अक्टूबर) पहले ही निकल चुकी थी, इसलिए उनका नाम मतपत्र पर बना रहेगा। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यही स्थिति मतदाताओं के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।
स्नातक-शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र आखिर कैसे काम करते हैं?
यह इन चुनावों का सबसे खास पहलू है — और सबसे कम समझा जाने वाला भी। संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत राज्य विधान परिषद के 1/12 सदस्य स्नातकों द्वारा और 1/12 शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं।
मतदाता वही बन सकता है जो कम से कम तीन साल से डिग्री धारक हो और राज्य का निवासी हो; शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में माध्यमिक स्तर से ऊपर के संस्थानों में कम से कम तीन साल पढ़ाने वाले शिक्षक ही पंजीकृत हो सकते हैं। इन्हें आम मतदाता सूची से अलग विशेष निर्वाचक नामावली में दर्ज होना पड़ता है।
मतदान भी अलग होता है — मतदाता उम्मीदवारों को 1, 2, 3... की वरीयता देते हैं, और गिनती एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली (सिंगल ट्रांसफरेबल वोट) से होती है। अतिरिक्त और सबसे कम मतों वाले उम्मीदवारों के वोट अगली वरीयता को हस्तांतरित होते हैं, ताकि विजेता को मतदाताओं का व्यापक समर्थन मिले। शायद यही वजह है कि राजद नेता तेजस्वी यादव ने स्नातक मतदाताओं से 23 अक्टूबर को 'पहली वरीयता' का वोट मांगा।
विधान परिषद के सदस्य छह साल के लिए चुने जाते हैं और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं — इसीलिए ये द्विवार्षिक चुनाव हो रहे हैं। इन आठ सीटों के मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 16 नवंबर को समाप्त हो रहा है।
इस चुनाव का राजनीतिक मतलब क्या है?
यह चुनाव सरकार नहीं बदलेगा — जन सुराज संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा है कि यह "सरकार बनाने या हटाने का चुनाव नहीं है... यह ऐसा चुनाव है जहां लोग अपने वोट से मौजूदा व्यवस्था को कस सकते हैं।" (देव डिस्कोर्स/एएनआई के अनुसार)
फिर भी इसके मायने गहरे हैं। पढ़े-लिखे मतदाताओं के बीच यह एनडीए की जमीनी पकड़ की परीक्षा है, और महागठबंधन की एकजुटता की भी — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार चार सीटों (पटना, दरभंगा, कोसी स्नातक और पटना शिक्षक) पर राजद और कांग्रेस के बीच 'फ्रेंडली फाइट' हो रही है, यानी गठबंधन के दोनों दल आमने-सामने हैं। जन सुराज के लिए यह पढ़े-लिखे वर्ग में अपनी पैठ साबित करने का मौका है।
चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूचियों पर चल रही बहस के संदर्भ में परकला प्रभाकर की SIR-विरोधी मार्च पर यह रिपोर्ट भी पढ़ें, और अदालतों के चुनावों पर पड़ने वाले असर को समझने के लिए आंध्र प्रदेश में नगर निकाय चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक से जुड़ी यह खबर देखें।
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