अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 अक्टूबर, 2026 को एक कार्यकारी आदेश (EO) पर हस्ताक्षर करके रूसी तेल खरीद पर लगने वाले 100 प्रतिशत तक के अतिरिक्त शुल्क को फिलहाल टाल दिया है। यह आदेश Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act 2026 के तहत लगने वाले शुल्कों और प्रतिबंधों से छूट देता है, और इसका सबसे बड़ा लाभार्थी भारत है — क्योंकि भारत रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है।

रिपोर्टों के अनुसार, यह छूट अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के उस बयान के कुछ दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश चल रही है। यानी यह छूट सिर्फ ऊर्जा की राजनीति नहीं, बल्कि बड़े व्यापार समीकरण का हिस्सा है।
यह आदेश क्या कहता है?
रिपोर्टों के अनुसार, Sanctioning Russia and Iran Act 2026 सितंबर 2026 में दोनों दलों के बहुमत से पारित हुआ था। इस कानून में यह प्रावधान था कि जो देश 18 अक्टूबर के बाद जानबूझकर रूसी कच्चा तेल या गैस की नई खरीद करेंगे, उन पर — रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े आयातकों में से — 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकेगा। ट्रंप के कार्यकारी आदेश ने इन निर्धारित शुल्कों और प्रतिबंधों को फिलहाल माफ कर दिया है।
60 दिन का 'विराम' — क्या खत्म हो जाएगा?
सबसे महत्वपूर्ण बारीकियां यही हैं। कार्यकारी आदेश में कोई तय समाप्ति तिथि नहीं है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 19 अक्टूबर को समरकंद में कहा कि ट्रंप आर्थिक प्रभावों का आकलन करने के लिए अधिकतम 60 दिनों का समय चाहते हैं। यानी यह 60 दिन की अवधि समीक्षा के लिए है, स्वतः समाप्ति की गारंटी नहीं — लेकिन रिपोर्टों के अनुसार इसका मतलब यह भी नहीं है कि 60 दिनों के बाद शुल्क अपने आप लग जाएंगे।
रुबियो ने यह भी कहा, "हम इस समय भारत के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। हम बहुत करीब हैं।" इससे साफ है कि व्यापार वार्ता इस छूट के फैसले का हिस्सा थी। उन्होंने ऊर्जा कीमतों और भूगोल ("geography is real") का हवाला देते हुए भी छूट को सही ठहराया।
फरवरी वाला ट्रैक भी जारी है
रिपोर्टों के अनुसार, यह राहत अकेली नहीं है। फरवरी 2026 में भी ट्रंप ने एक अलग कार्यकारी आदेश (6 फरवरी) के जरिए रूसी तेल के मुद्दे पर लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क हटा दिया था, और पारस्परिक शुल्क (reciprocal tariff) को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही भारत ने अगले 5 वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा, विमान और प्रौद्योगिकी में 500 अरब डॉलर की खरीद का संकेत दिया है।
इस बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर और मार्को रुबियो की मुलाकात 20 अक्टूबर को हुई, जिससे संकेत मिलता है कि वार्ता तेज गति से आगे बढ़ रही है।
हमारा विश्लेषण
यह घटनाक्रम दिखाता है कि अमेरिका का टैरिफ हथियार अब रूसी तेल पर भारत की निर्भरता को तुरंत दंडित करने के बजाय, एक व्यापक व्यापार समझौते की मेज़बानी में इस्तेमाल हो रहा है। भारत के लिए यह दोहरी राहत है — तेल की आपूर्ति शृंखला बनी रहेगी और निर्यातकों पर अतिरिक्त टैरिफ का बोझ टलेगा। लेकिन 60 दिन की समीक्षा अवधि एक अस्थायी खिड़की है; स्थायी स्थिरता तभी मिलेगी जब व्यापार समझौता पक्का होगा। इस दौरान भारत का 500 अरब डॉलर की खरीद का प्रस्ताव बातचीत की सबसे बड़ी पूंजी बना रहेगा।
ऊर्जा और व्यापार के इस जुड़ाव पर हमारा विस्तृत विश्लेषण पढ़ें: भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते का टैरिफ विश्लेषण और भारत की विदेश नीति के नए समीकरण।
सूत्र: आउटलुक इंडिया, न्यूज़18 एक्सप्लेनर
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