PM Modi Hails World Bank Poverty Report: Historic Fall in Extreme Poverty, Gini Down to 23

1 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट के निष्कर्षों को साझा करते हुए भारत में गरीबी में आई गिरावट को ऐतिहासिक बताया। रिपोर्ट का नाम है 'इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ: अक्टूबर 2026'। मोदी ने कहा कि दुनिया में सबसे तेज़ी से गरीबी घटाने वाले देशों में भारत शामिल है — और यह बात उन्होंने अपनी ओर से नहीं, विश्व बैंक के हवाले से कही।

गरीबी में कमी और बढ़ती समृद्धि का चित्रण, गाँव के परिवार और उगता सूरज, ऊपर सुनहरे अक्षरों में गरीबी में बड़ी गिरावट लिखा है

इस रिपोर्ट के मुख्य आंकड़ों — अत्यधिक गरीबी का 27.1 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत होना और 49.6 करोड़ लोगों का गरीबी रेखा से ऊपर उठना — पर हम पहले ही विस्तार से लिख चुके हैं। पिछली पोस्ट में पूरी रिपोर्ट का लेखा-जोखा पढ़ें। इस पोस्ट में वह सब कुछ है जो 1 नवंबर की प्रतिक्रिया के साथ सामने आया: मोदी ने क्या कहा, रिपोर्ट के वे आंकड़े जो सुर्खियों में कम आए, और बैंक की अपनी चेतावनियाँ।

मोदी ने क्या कहा

प्रधानमंत्री ने कहा, "India has recorded one of the fastest poverty declines in the world. This is what the World Bank is saying।" यानी, दुनिया में सबसे तेज़ गरीबी घटाने का रिकॉर्ड भारत के नाम है, और यह विश्व बैंक कह रहा है।

उन्होंने 49.6 करोड़ लोगों के 2011 से 2023 के बीच गरीबी से बाहर निकलने का ज़िक्र किया। उनके अनुसार अत्यधिक गरीबी की दर लगभग 90 प्रतिशत घटी है — पहले हर चार में से एक से ज़्यादा भारतीय अत्यधिक गरीबी में था, अब यह अनुपात लगभग 38 में से एक रह गया है।

मोदी ने असमानता के आंकड़े पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने बताया कि भारत का गिनी इंडेक्स — आय की असमानता मापने का प्रमुख पैमाना — 20 प्रतिशत से ज़्यादा घटकर 23.0 पर आ गया है। यानी गरीबी घटी ही नहीं, अमीर-गरीब के बीच की खाई भी सिकुड़ी है, ऐसा रिपोर्ट का निष्कर्ष है।

सुर्खियों से आगे: रिपोर्ट के दूसरे अहम आंकड़े

रिपोर्ट सिर्फ पैसों की गरीबी नहीं मापती। ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के अनुसार गैर-मौद्रिक गरीबी 2005-06 के 53.8 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 16.4 प्रतिशत रह गई। विश्व बैंक का अपना बहुआयामी माप 2022-23 में 15.5 प्रतिशत पर था।

आगे का अनुमान भी रिपोर्ट में है, पर वह पक्का वादा नहीं है। 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली रेखा पर गरीबी 2026 में 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत होने का अनुमान है — और बैंक ने साफ कहा है कि ये सांकेतिक अनुमान हैं, जो नए आंकड़े आते ही बदल सकते हैं।

मज़बूत खपत वृद्धि और आर्थिक गतिविधि भी इस कहानी का हिस्सा है — अक्टूबर में जीएसटी संग्रह के रिकॉर्ड स्तर पर भी हमने हाल में लिखा है। अक्टूबर जीएसटी संग्रह से जुड़ी पोस्ट यहाँ पढ़ें।

चेतावनियाँ: नौकरियों की गुणवत्ता अब असली परीक्षा है

रिपोर्ट की सबसे अहम चेतावनी रोजगार को लेकर है। युवा बेरोजगारी वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही के 14.6 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में 15.9 प्रतिशत हो गई है, और ग्रामीण युवा महिलाओं में यह समस्या ज़्यादा है।

साथ ही, वास्तविक आय मोटे तौर पर स्थिर रही है, और रोजगार वृद्धि अपेक्षाकृत कम उत्पादकता वाले कामों में केंद्रित रही है। यानी काम बढ़े हैं, पर बेहतर वेतन वाले उत्पादक कामों की कमी अब भी गरीबी घटाने की रफ्तार को थाम सकती है।

क्षेत्रीय असमानता भी बनी हुई है — रिपोर्टों के अनुसार भारत के लगभग 57 प्रतिशत गरीब उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैली एक पट्टी में रहते हैं। बैंक ने यह भी कहा है कि हाल की कुछ प्रगति में मापन के बेहतर तरीकों का भी योगदान हो सकता है, सिर्फ वास्तविक जीवन-स्तर में सुधार का नहीं।

सियासी प्रतिक्रिया

भाजपा ने रिपोर्ट को मोदी सरकार की नीतियों का नतीजा बताया है। डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार पार्टी ने कहा कि गरीबी में तेज गिरावट निरंतर नीतिगत प्रयासों का प्रतिबिंब है। पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक आशीष उषा अग्रवाल ने 57.7 प्रतिशत से 16.1 प्रतिशत तक की गिरावट का हवाला भी दिया।

कुल मिलाकर तस्वीर दोहरी है। गरीबी रेखा के आंकड़े ऐतिहासिक हैं, और असमानता भी घटी है — पर अगला अध्याय इस बात पर तय होगा कि सबसे गरीब राज्यों में उत्पादक नौकरियाँ कितनी तेज़ी से बनती हैं। 2028 का अनुमान एक दिशा दिखाता है, मंज़िल की गारंटी नहीं देता।

विश्व बैंक की रिपोर्ट पर मूल खबरें यहाँ पढ़ें: Oneindia और Deccan Herald।

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